मंत्र और चालीसा

गणेश चालीसा: अर्थ सहित

सभी चौपाइयाँ और दोहे, हर पंक्ति के सरल हिंदी अर्थ के साथ।

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गणेश चालीसा भगवान गणेश की सरल हिंदी स्तुति है। एक चौपाई में प्रयाग के पास ककरा के कवि रामसुंदर का नाम आता है; उनके समय की जानकारी नहीं मिलती, और यह स्तुति उत्तर भारत में हर शुभ काम से पहले और गणेश जी के दिनों पर गाई जाती है।

गणेश चालीसा अर्थ सहित

  1. दोहा

    जय गणपति सद्गुणसदन कविवर बदन कृपाल।विघ्न हरण मंगल करण जय जय गिरिजालाल॥

    Jai Ganpati sadgun sadan, kavivar badan kripalVighna haran mangal karan, jai jai Girijalal

    हे सद्गुणों के धाम, कवियों में श्रेष्ठ मुख वाले कृपालु गणपति, आपकी जय हो; विघ्न हरने और मंगल करने वाले गिरिजा-पुत्र, आपकी जय हो।

  2. चौपाई 1

    जय जय जय गणपति राजू।मंगल भरण करण शुभ काजू॥

    Jai jai jai Ganpati rajuMangal bharan karan shubh kaju

    हे गणपति राजा, आपकी जय हो; आप मंगल से भरते और हर काम शुभ करते हैं।

  3. चौपाई 2

    जय गजबदन सदन सुखदाता।विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥

    Jai Gajbadan sadan sukhdataVishva Vinayak buddhi vidhata

    हे गजबदन, सुख के धाम और दाता, विश्व विनायक और बुद्धि के विधाता, आपकी जय हो।

  4. चौपाई 3

    वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन।तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥

    Vakra tund shuchi shund suhavanTilak tripund bhal man bhavan

    आपकी टेढ़ी, पवित्र सूँड सुहावनी है, और माथे पर त्रिपुंड तिलक मन को भाता है।

  5. चौपाई 4

    राजित मणि मुक्तन उर माला।स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥

    Rajit mani muktan ur malaSwarn mukut shir nayan vishala

    छाती पर मणियों और मोतियों की माला है, सिर पर सोने का मुकुट है और नेत्र विशाल हैं।

  6. चौपाई 5

    पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥

    Pustak pani kuthar trishulamModak bhog sugandhit phoolam

    आपके हाथों में पुस्तक, फरसा और त्रिशूल हैं; आपको मोदक का भोग और सुगंधित फूल चढ़ते हैं।

  7. चौपाई 6

    सुन्दर पीताम्बर तन साजित।चरण पादुका मुनि मन राजित॥

    Sundar pitambar tan sajitCharan paduka muni man rajit

    सुंदर पीतांबर आपके शरीर पर सजा है, और आपके चरण-पादुका मुनियों के मन में बसते हैं।

  8. चौपाई 7

    धनि शिवसुवन षडानन भ्राता।गौरी ललन विश्व-विधाता॥

    Dhani Shiv suvan Shadanan bhrataGauri lalan vishva vidhata

    धन्य हैं शिव के पुत्र, षडानन के भाई, गौरी के लाल और विश्व के विधाता।

  9. चौपाई 8

    ऋद्धि सिद्धि तव चँवर सुधारे।मूषक वाहन सोहत द्वारे॥

    Riddhi Siddhi tav chanvar sudhareMushak vahan sohat dware

    ऋद्धि और सिद्धि आप पर चँवर डुलाती हैं, और मूषक वाहन द्वार पर शोभा देता है।

  10. चौपाई 9

    कहौं जन्म शुभ कथा तुम्हारी।अति शुचि पावन मंगल कारी॥

    Kahaun janm shubh katha tumhariAti shuchi pavan mangal kari

    मैं आपके जन्म की शुभ कथा कहता हूँ, जो अत्यंत पवित्र और मंगलकारी है।

  11. चौपाई 10

    एक समय गिरिराज कुमारी।पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥

    Ek samay Giriraj kumariPutra hetu tap keenha bhari

    एक समय गिरिराज की पुत्री (पार्वती) ने पुत्र के लिए भारी तप किया।

  12. चौपाई 11

    भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।तब पहुँच्यो तुम धरि द्विज रूपा॥

    Bhayo yagya jab purna anupaTab pahunchyo tum dhari dwij rupa

    जब उनका अनुपम यज्ञ पूरा हुआ, तब आप ब्राह्मण का रूप धरकर पहुँचे।

  13. चौपाई 12

    अतिथि जानि कै गौरी सुखारी।बहु विधि सेवा करी तुम्हारी॥

    Atithi jani kai Gauri sukhariBahu vidhi seva kari tumhari

    आपको अतिथि जानकर गौरी प्रसन्न हुईं और अनेक प्रकार से आपकी सेवा की।

  14. चौपाई 13

    अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा।मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥

    Ati prasann hvai tum var deenhaMatu putra hit jo tap keenha

    अत्यंत प्रसन्न होकर आपने वर दिया, क्योंकि माता ने पुत्र के लिए तप किया था।

  15. चौपाई 14

    मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला।बिना गर्भ धारण यहि काला॥

    Milahi putra tuhi buddhi vishalaBina garbh dharan yahi kala

    तुम्हें इसी समय, बिना गर्भ धारण किए, विशाल बुद्धि वाला पुत्र मिलेगा।

  16. चौपाई 15

    गणनायक गुण ज्ञान निधाना।पूजित प्रथम रूप भगवाना॥

    Gananayak gun gyan nidhanaPujit pratham roop Bhagvana

    वह गणों का नायक, गुण और ज्ञान का भंडार, और प्रथम पूजित भगवान होगा।

  17. चौपाई 16

    अस कहि अन्तर्ध्यान रूप ह्वै।पलना पर बालक स्वरूप ह्वै॥

    As kahi antardhyan roop hvaiPalna par balak swaroop hvai

    ऐसा कहकर आप अंतर्धान हो गए और पालने में बालक रूप में प्रकट हुए।

  18. चौपाई 17

    बनि शिशु रुदन जबहि तुम ठाना।लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥

    Bani shishu rudan jabahi tum thanaLakhi mukh sukh nahin Gauri samana

    जब आप शिशु बनकर रोने लगे, तो आपका मुख देखकर गौरी के सुख का ठिकाना न रहा।

  19. चौपाई 18

    सकल मगन सुख मंगल गावहिं।नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं॥

    Sakal magan sukh mangal gavahinNabh te suran suman varshavahin

    सब मगन होकर मंगल गीत गाने लगे, और देवता आकाश से फूल बरसाने लगे।

  20. चौपाई 19

    शम्भु उमा बहुदान लुटावहिं।सुर मुनि जन सुत देखन आवहिं॥

    Shambhu Uma bahu dan lutavahinSur muni jan sut dekhan avahin

    शंभु और उमा ने बहुत दान लुटाया, और देवता, मुनि और लोग पुत्र को देखने आए।

  21. चौपाई 20

    लखि अति आनन्द मंगल साजा।देखन भी आये शनि राजा॥

    Lakhi ati anand mangal sajaDekhan bhi aye Shani raja

    इतना आनंद और मंगल देखकर शनि राजा भी देखने आए।

  22. चौपाई 21

    निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।बालक देखन चाहत नाहीं॥

    Nij avgun guni Shani man mahinBalak dekhan chahat nahin

    अपनी दृष्टि का दोष जानकर शनि मन ही मन बालक को देखना नहीं चाहते थे।

  23. चौपाई 22

    गिरजा कछु मन भेद बढ़ायो।उत्सव मोर न शनि तुहि भायो॥

    Girija kachhu man bhed badhayoUtsav mor na Shani tuhi bhayo

    गिरिजा के मन में कुछ खटास आई और बोलीं, शनि, क्या तुम्हें मेरा उत्सव अच्छा नहीं लगा?

  24. चौपाई 23

    कहन लगे शनि मन सकुचाई।का करिहौ शिशु मोहि दिखाई॥

    Kahan lage Shani man sakuchaiKa karihau shishu mohi dikhai

    शनि संकोच से कहने लगे, बालक मुझे दिखाकर क्या करोगी?

  25. चौपाई 24

    नहिं विश्वास उमा कर भयऊ।शनि सों बालक देखन कह्यऊ॥

    Nahin vishvas Uma kar bhayauShani son balak dekhan kahyau

    उमा को विश्वास नहीं हुआ और उन्होंने शनि से बालक को देखने को कहा।

  26. चौपाई 25

    पड़तहिं शनि दृग कोण प्रकाशा।बालक शिर उड़ि गयो आकाशा॥

    Padatahin Shani drig kon prakashaBalak shir udi gayo akasha

    शनि की तिरछी दृष्टि पड़ते ही बालक का सिर उड़कर आकाश में चला गया।

  27. चौपाई 26

    गिरजा गिरीं विकल ह्वै धरणी।सो दुख दशा गयो नहिं वरणी॥

    Girija girin vikal hvai dharaniSo dukh dasha gayo nahin varani

    गिरिजा व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़ीं; उस दुख का वर्णन नहीं हो सकता।

  28. चौपाई 27

    हाहाकार मच्यो कैलाशा।शनि कीन्ह्यों लखि सुत को नाशा॥

    Hahakar machyo KailashaShani keenhyo lakhi sut ko nasha

    कैलाश पर हाहाकार मच गया कि शनि ने देखकर पुत्र का नाश कर दिया।

  29. चौपाई 28

    तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाये।काटि चक्र सो गज शिर लाये॥

    Turat Garud chadhi Vishnu sidhayeKati chakra so gaj shir laye

    विष्णु तुरंत गरुड़ पर चढ़कर गए और चक्र से काटकर हाथी का सिर ले आए।

  30. चौपाई 29

    बालक के धड़ ऊपर धारयो।प्राण मंत्र पढ़ शंकर डारयो॥

    Balak ke dhad upar dharyoPran mantra padh Shankar daryo

    उसे बालक के धड़ पर रखा, और शंकर ने मंत्र पढ़कर प्राण डाले।

  31. चौपाई 30

    नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे।प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे॥

    Nam Ganesh Shambhu tab keenhePratham pujya buddhi nidhi var deenhe

    तब शंभु ने उनका नाम गणेश रखा और प्रथम पूज्य व बुद्धि के भंडार होने का वर दिया।

  32. चौपाई 31

    बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा।पृथ्वी की प्रदक्षिणा लीन्हा॥

    Buddhi pariksha jab Shiv keenhaPrithvi ki pradakshina leenha

    जब शिव ने बुद्धि की परीक्षा ली, तो पृथ्वी की परिक्रमा करने को कहा।

  33. चौपाई 32

    चले षडानन भरमि भुलाई।रची बैठ तुम बुद्धि उपाई॥

    Chale Shadanan bharami bhulaiRachi baith tum buddhi upai

    षडानन भ्रम में पड़कर चल दिए, पर आपने बैठकर बुद्धि से उपाय सोचा।

  34. चौपाई 33

    चरण मातु-पितु के धर लीन्हें।तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥

    Charan matu pitu ke dhar leenheinTinke sat pradakshin keenhein

    आपने माता-पिता के चरण पकड़े और उनकी सात परिक्रमा की।

  35. चौपाई 34

    धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे।नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥

    Dhani Ganesh kahi Shiv hiy harasheNabh te suran suman bahu barase

    शिव ने हृदय से प्रसन्न होकर कहा, धन्य हो गणेश, और देवताओं ने आकाश से बहुत फूल बरसाए।

  36. चौपाई 35

    तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।शेष सहस मुख सकै न गाई॥

    Tumhri mahima buddhi badaiShesh sahas mukh sakai na gai

    आपकी महिमा और बुद्धि की बड़ाई हज़ार मुख वाले शेषनाग भी नहीं गा सकते।

  37. चौपाई 36

    मैं मति हीन मलीन दुखारी।करहुँ कौन बिधि विनय तुम्हारी॥

    Main mati heen maleen dukhariKarahun kaun bidhi vinay tumhari

    मैं बुद्धिहीन, मलिन और दुखी हूँ; किस विधि से आपकी विनती करूँ?

  38. चौपाई 37

    भजत रामसुन्दर प्रभुदासा।लख प्रयाग ककरा दुर्वासा॥

    Bhajat Ramsundar prabhudasaLakh Prayag Kakra Durvasa

    प्रभु के दास रामसुंदर आपको भजते हैं, जो प्रयाग के पास ककरा में दुर्वासा के स्थान के निकट हैं।

  39. चौपाई 38

    अब प्रभु दया दीन पर कीजै।अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥

    Ab prabhu daya deen par keejaiApni shakti bhakti kuchh deejai

    प्रभु, अब इस दीन पर दया कीजिए और अपनी कुछ शक्ति और भक्ति दीजिए।

  40. अंतिम दोहा

    श्री गणेश यह चालीसा पाठ करें धर ध्यान।नित नव मंगल गृह बसै लहे जगत सन्मान॥

    Shri Ganesh yah Chalisa, path karein dhar dhyanNit nav mangal grih basai, lahe jagat sanman

    जो ध्यान लगाकर यह गणेश चालीसा पढ़ते हैं, उनके घर में नित नए मंगल बसते हैं और जग में सम्मान मिलता है।

  41. अंतिम दोहा

    संवत् अपन सहस्र दश ऋषि पंचमी दिनेश।पूरण चालीसा भयो मंगल मूर्ति गणेश॥

    Samvat apan sahasra dash, Rishi Panchami dineshPuran Chalisa bhayo, mangal murti Ganesh

    यहाँ दिए गए संवत में, ऋषि पंचमी के रविवार को यह चालीसा पूरी हुई, हे मंगलमूर्ति गणेश।

गणेश आरती: जय गणेश जय गणेश देवा

रचना: परंपरागत

  1. जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।माता जाकी पारवती पिता महादेवा॥

    Jai Ganesh jai Ganesh jai Ganesh devaMata jaki Parvati pita Mahadeva

  2. एकदन्त दयावन्त चारभुजाधारी।माथे पर तिलक सोहे मूसे की सवारी॥

    Ekdant dayavant char bhuja dhariMathe par tilak sohe moose ki savari

  3. पान चढ़े फल चढ़े और चढ़े मेवा।लड्डुअन का भोग लगे सन्त करें सेवा॥

    Pan chadhe phal chadhe aur chadhe mevaLadduan ka bhog lage sant karein seva

  4. अंधे को आँख देत कोढ़िन को काया।बाँझन को पुत्र देत निर्धन को माया॥

    Andhe ko aankh det kodhin ko kayaBanjhan ko putra det nirdhan ko maya

  5. सूर श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा।जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा॥

    Soor Shyam sharan aaye saphal keeje sevaJai Ganesh jai Ganesh jai Ganesh deva

गणेश देव की जय हो, जिनकी माता पार्वती और पिता महादेव हैं: एकदंत, दयालु, चार भुजाओं वाले, माथे पर तिलक और मूषक की सवारी। उन्हें पान, फल, मेवा और लड्डुओं का भोग लगता है; वे अंधे को आँख, रोगी को काया, निःसंतान को पुत्र और निर्धन को धन देते हैं। भक्त उनकी शरण में आकर अपनी सेवा सफल करने की प्रार्थना करता है।

गणेश आरती: अर्थ और पूजा विधि के साथ अलग पेज पर

गणेश चालीसा के बारे में

वक्रतुंड, माथे पर त्रिपुंड, मोदक और मूषक वाहन के वर्णन के बाद इसमें उनके जन्म की कथा है: पुत्र के लिए पार्वती का तप, गणेश का ब्राह्मण अतिथि बनकर आना और फिर पालने में बालक रूप में प्रकट होना, और शनि की दृष्टि से बालक का सिर उड़ जाना, जिसकी जगह विष्णु हाथी का सिर लाए।

अंत में बुद्धि-परीक्षा की कथा है: कार्तिकेय पृथ्वी की परिक्रमा को चल पड़े, पर गणेश ने माता-पिता की सात परिक्रमा की और प्रथम पूज्य बने। अंतिम दोहों में कहा गया है कि इसके पाठ से घर में नित नए मंगल होते हैं।

गणेश चालीसा की पारंपरिक पाठ विधि

  • किसी नए काम की शुरुआत, पूजा के आरंभ में या बुधवार को इसका पाठ करें।
  • हर महीने संकष्टी चतुर्थी, विनायक चतुर्थी और गणेश चतुर्थी के दस दिनों में इसका विशेष पाठ होता है।
  • दूर्वा, मोदक या लड्डू, लाल फूल और दीपक अर्पित करें।
  • ज्योतिष में गणेश पूजा केतु के लिए और बुद्धि के ग्रह बुध के लिए की जाती है।

गणेश चालीसा और ग्रह

ज्योतिष में गणेश चालीसा का पाठ आमतौर पर केतु और बुध के लिए किया जाता है। इसके साथ इन ग्रहों के बीज मंत्र भी जप सकते हैं:

यह भी पढ़ें

मंत्र और चालीसा आस्था और परंपरा का विषय हैं, और अलग-अलग परिवारों व गुरुओं की विधि में अंतर होता है। यहाँ दी गई जानकारी चिकित्सा, कानूनी या वित्तीय सलाह का विकल्प नहीं है।

सवाल-जवाब

गणेश चालीसा: सवाल-जवाब

गणेश चालीसा किसने लिखी?

37वीं चौपाई में कवि रामसुंदर का नाम आता है, जो प्रयाग के पास ककरा में रहते थे। उनके समय का उल्लेख नहीं मिलता, इसलिए इसे परंपरागत स्तुति माना जाता है।

गणेश जी का सिर हाथी का क्यों है?

चालीसा के अनुसार शनि की दृष्टि पड़ते ही नवजात बालक का सिर उड़ गया; विष्णु हाथी का सिर लाए, जिसे शंकर जी ने बालक के धड़ पर रखकर प्राण डाले।

गणेश जी की पूजा सबसे पहले क्यों होती है?

शिव जी ने पुत्रों की बुद्धि-परीक्षा ली तो कार्तिकेय पृथ्वी की परिक्रमा को दौड़े, पर गणेश ने माता-पिता की सात परिक्रमा की। प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें प्रथम पूज्य होने का वर दिया।

नवग्रह बीज मंत्र

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