मंत्र और चालीसा
दशरथ कृत शनि स्तोत्र: अर्थ सहित
पद्म पुराण के दस संस्कृत श्लोक, हर श्लोक के सरल हिंदी अर्थ के साथ।
दशरथ कृत शनि स्तोत्र शनिदेव की स्तुति है, जिसे पद्म पुराण में भगवान राम के पिता राजा दशरथ के मुख से कहा गया है। यह शनिदेव की सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली प्रार्थनाओं में से एक है, ख़ासकर शनिवार को और साढ़ेसाती व ढैया के समय।
दशरथ कृत शनि स्तोत्र अर्थ सहित
- श्लोक 1
नमः कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च।नमः कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नमः॥
Namah krishnaya nilaya shitikantha-nibhaya chaNamah kalagni-rupaya kritantaya cha vai namah
काले और नीले वर्ण वाले, भगवान शिव के नीले कंठ जैसी आभा वाले शनिदेव को नमस्कार। कालाग्नि के रूप वाले और सबका अंत करने वाले कृतांत को नमस्कार।
- श्लोक 2
नमो निर्मांसदेहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।नमो विशालनेत्राय शुष्कोदरभयाकृते॥
Namo nirmamsa-dehaya dirgha-shmashru-jataya chaNamo vishala-netraya shushkodara-bhayakrite
जिनका शरीर दुबला है, लंबी दाढ़ी और जटाएँ हैं, उन्हें नमस्कार। बड़े नेत्रों वाले, सूखे उदर और भय उत्पन्न करने वाले रूप वाले को नमस्कार।
- श्लोक 3
नमः पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नमः।नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते॥
Namah pushkala-gatraya sthula-romne'tha vai namahNamo dirghaya shushkaya kala-damshtra namo'stu te
विशाल अंगों और घने रोम वाले को नमस्कार। लंबे और दुबले शरीर वाले को नमस्कार; काल जैसी दाढ़ों वाले, आपको नमस्कार।
- श्लोक 4
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नमः।नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने॥
Namaste kotarakshaya durnirikshyaya vai namahNamo ghoraya raudraya bhishanaya kapaline
धँसी हुई आँखों वाले, जिन्हें देख पाना कठिन है, आपको नमस्कार। घोर, रौद्र, भीषण और कपाल धारण करने वाले को नमस्कार।
- श्लोक 5
नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते।सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च॥
Namaste sarva-bhakshaya balimukha namo'stu teSuryaputra namaste'stu bhaskare'bhayadaya cha
सब कुछ भक्षण करने वाले आपको नमस्कार; हे बलीमुख, आपको नमस्कार। हे सूर्यपुत्र, अभय देने वाले, आपको नमस्कार।
- श्लोक 6
अधोदृष्टे नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते।नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तु ते॥
Adho-drishte namaste'stu samvartaka namo'stu teNamo manda-gate tubhyam nistrimshaya namo'stu te
नीचे की ओर दृष्टि रखने वाले आपको नमस्कार; हे संवर्तक, प्रलय करने वाले, आपको नमस्कार। धीमी गति वाले, तलवार की धार जैसे तीक्ष्ण, आपको नमस्कार।
- श्लोक 7
तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च।नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नमः॥
Tapasa dagdha-dehaya nityam yoga-rataya chaNamo nityam kshudhartaya atriptaya cha vai namah
तप से जिनका शरीर तपा हुआ है और जो सदा योग में लीन रहते हैं, सदा भूखे और कभी तृप्त न होने वाले उन शनिदेव को नमस्कार।
- श्लोक 8
ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मजसूनवे।तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्॥
Jnana-chakshur namaste'stu kashyapatmaja-sunaveTushto dadasi vai rajyam rushto harasi tatkshanat
ज्ञान रूपी नेत्र वाले, कश्यप के पुत्र सूर्य के पुत्र, आपको नमस्कार। प्रसन्न होकर आप राज्य दे देते हैं और रुष्ट होकर उसी क्षण छीन लेते हैं।
- श्लोक 9
देवासुरमनुष्याश्च सिद्धविद्याधरोरगाः।त्वया विलोकिताः सर्वे नाशं यान्ति समूलतः॥
Devasura-manushyashcha siddha-vidyadharoragahTvaya vilokitah sarve nasham yanti samulatah
देवता, असुर, मनुष्य, सिद्ध, विद्याधर और नाग: जिन पर भी आपकी दृष्टि पड़ती है, वे जड़ से नष्ट हो जाते हैं।
- श्लोक 10
प्रसादं कुरु मे देव वरार्होऽहमुपागतः।एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबलः॥
Prasadam kuru me deva vararho'ham upagatahEvam stutas tada saurir graharajo mahabalah
हे देव, मुझ पर कृपा करें; मैं वरदान के योग्य होकर आपके पास आया हूँ। (पुराण आगे कहता है:) इस तरह स्तुति किए जाने पर महाबली ग्रहराज शनि प्रसन्न हुए।
दशरथ कृत शनि स्तोत्र के बारे में
कथा के अनुसार, राजा दशरथ को पता चलता है कि शनि रोहिणी नक्षत्र को भेदने वाले हैं, जिससे बारह साल का अकाल पड़ने की बात कही जाती है। वे स्वयं शनिदेव का सामना करने निकल पड़ते हैं; उनके साहस से प्रसन्न होकर शनिदेव उन्हें वरदान देते हैं, और तब दशरथ इन श्लोकों से उनकी स्तुति करते हैं।
स्तुति से प्रसन्न होकर शनिदेव पुराण में वचन देते हैं कि जो इसे दिन में एक या दो बार पढ़ेगा, वह उनकी दी हुई पीड़ा से मुक्त होगा। श्लोकों में शनिदेव के श्याम, तपस्वी रूप, उनकी धीमी गति और देने-लेने की उनकी शक्ति का वर्णन है, और उनसे कृपा की प्रार्थना है।
दशरथ कृत शनि स्तोत्र की पारंपरिक पाठ विधि
- शनिवार पारंपरिक दिन है; अच्छा हो कि स्नान के बाद शाम को पाठ करें।
- बहुत से लोग पीपल के नीचे या शनि मंदिर में तिल के तेल का दीपक जलाते हैं और काले तिल या उड़द अर्पित करते हैं।
- साढ़ेसाती, ढैया या शनि की कठिन दशा में आमतौर पर इसका पाठ दिन में एक या दो बार किया जाता है।
- कुछ लोग इसके साथ शनि बीज मंत्र और हनुमान चालीसा का पाठ भी करते हैं।
दशरथ कृत शनि स्तोत्र और ग्रह
ज्योतिष में दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ आमतौर पर शनि के लिए किया जाता है। इसके साथ इन ग्रहों के बीज मंत्र भी जप सकते हैं:
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मंत्र और चालीसा आस्था और परंपरा का विषय हैं, और अलग-अलग परिवारों व गुरुओं की विधि में अंतर होता है। यहाँ दी गई जानकारी चिकित्सा, कानूनी या वित्तीय सलाह का विकल्प नहीं है।
सवाल-जवाब
दशरथ कृत शनि स्तोत्र: सवाल-जवाब
शनि स्तोत्र किसने लिखा?
पद्म पुराण (उत्तर खंड) इसे भगवान राम के पिता राजा दशरथ की रचना बताता है, जिसे उन्होंने शनिदेव की कृपा पाने के लिए पढ़ा था।
दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
शनिवार को, परंपरा से शाम के समय, और साढ़ेसाती या ढैया में रोज़। पुराण में दिन में एक या दो बार पाठ का उल्लेख है।
शनि स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ होता है?
पद्म पुराण में शनिदेव वचन देते हैं कि इसका पाठ करने वाले उनकी दी हुई पीड़ा से मुक्त होंगे। भक्त कठिन शनि दशा में धैर्य और राहत के लिए इसका पाठ करते हैं; इसे आस्था का अभ्यास मानें, गारंटी नहीं।
क्या शनि स्तोत्र और शनि चालीसा एक ही हैं?
नहीं। शनि स्तोत्र पद्म पुराण के दस संस्कृत श्लोक हैं, जो राजा दशरथ से जुड़े हैं। शनि चालीसा बाद की, किसी दूसरे लेखक की चालीस चौपाइयों वाली हिंदी स्तुति है।
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